Uncategorized

गुरला में घर-घर गूंज रहे गणगौर के गीत, होली से 16 दिन वे शिव मंदिर में होती सामूहिक पूजा

गुरला में घर-घर गूंज रहे गणगौर के गीत, होली से 16 दिन वे शिव मंदिर में होती सामूहिक पूजा

 

*सत्यनारायण सेन गुरला*

 

होली के बाद गणगौर की धूम है. विवाहिताएं पति की लंबी उम्र व कुंवारी लड़कियां अच्छे वर की कामना में गणगौर का व्रत रखती हैं.

 

भीलवाड़ा जिले के गुरला में बस स्टैंड स्थित सदाबहार महादेव मंदिर में होली के बाद सुहाग का प्रतीक माने जाने वाली गणगौर की धूम है. राजशाही से पहले से चला आ रहा गणगौर ना सिर्फ विवाहिताएं, बल्कि कुंवारी कन्याएं भी हर्षोल्लाह से मनाती हैं. मान्यता है कि विवाहिताएं पति की लंबी उम्र के लिए गणगौर का व्रत और विशेष पूजा करती हैं तो कुंवारी लड़कियां अच्छे वर की कामना में व्रत रखती हैं.

 

मीरा देवी सेन बताया कि होलिका दहन के अगले दिन से कुंवारी कन्याएं व विवाहिताएं गणगौर पूजने लगती है. कन्याएं और नवविवाहित महिलाएं सुबह फूल चुनने के बाद घर का पवित्र जल कलश में भरकर ईसर-गणगौर पूजती हैं. सुबह महिलाएं बगीचे में जाती है और दूब लाती हैं. गोर ये गणगौर माता खोल किवाड़ी, बाहर ऊबी थारी पूजन वाली, गोर-गोर गोमती जोड़ा पूजा पार्वती का आला गीला लगी, महाक कुकू का टीका, टीका दिया ठुमका दिया बाला रानी व्रत कयो व बाड़ी वाला बाड़ी खोल, म्हैं आया थारी दोब ने…आदि गीत गाती हैं. महिलाएं तय जगह जुटती हैं और कनिष्ठा से जोड़ा बनाकर गणगौर पूजा करती है.महिलाओं ने ईसर-गणगौर की महिमा में सुमधुर लोकगीतों का गायन किया। “पूजन द्यो गणगौर भँवर म्हाने…” और “गोर ए गणगौर माता खोल किवाड़ी…” जैसे पारंपरिक गीतों की गूंज से पूरा वातावरण भक्तिमय और आनंदित हो उठा।

 

 

रेखा सेन व मधु सेन ने बताया 16 दिन तक माता गणगौर की पूजा होती है. होलिका दहन की राख से कई महिलाएं पिंड बनाकर पूजा करती हैं, फिर सात दिन के बाद बासेड़ा यानी शीतला अष्टमी को लकड़ी अथवा मिट्टी के बने ईसर और गौरा यानी कि शिव और पार्वती को गणगौर के रूप में घर लाया जाता है. नई-नवेली दुल्हनों के घर में यह त्योहार खासा उत्साह से मनाया जाता है. मां और सास सिंजारा करती हैं. बहू-बेटियों का सत्कार किया जाता है. उनके हाथों में मेहंदी रचाई जाती है. परंपरा है कि बहू बेटी का पहला गणगौर मायके में होता है. हालांकि, सुविधा के अभाव में यह ससुराल में भी किया जा सकता है.

 

उषा पायल कोमल सारिका ने बताया कि कुंवारी कन्याएं अच्छे घर व वर की चाह में गणगौर की पूजा करती हैं. धारणा है कि अच्छा पति और घराना मिले इसलिए कुंवारी लड़कियां गणगौर पूजती हैं. गणगौर उत्सव शुरू होते ही शहर में पारंपरिक गीतों की गूंज सुनाई देने लगी है.

 

गणगौर को सुहाग और सौभाग्य का प्रतीक मानकर, विवाहित महिलाओं ने अपने पति की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना की, जबकि अविवाहित कन्याओं ने अच्छे वर की मनोकामना के साथ पूजा-अर्चना की।

 

*ऐसे होती है पूजा:* गणगौर पूजन के लिए कुंवारी कन्याएं और सुहागिन सुबह में सुंदर वस्त्र, आभूषण पहन कर सिर पर लोटा लेकर बगीचों में जाती हैं. ताजा जल लोटों में भरकर हरी दूब और फूल सजाकर सिर पर रखकर गणगौर के गीत गाती घर आती हैंं.

 

*पूजा का महत्व:* गणगौर पूजन के आठवें दिन तीजणियां घुड़ला पूजती हैं. शीतलाष्टमी पर तीजणियां ढोल-थाली के साथ पवित्र मिट्टी से निर्मित घुड़ला लाकर पूजती हैं. इसके 15 दिन पार्वती (गौरी) पूजन करने वाली तीजणियां छिद्रयुक्त घुड़ले में आत्मदर्शन के प्रतीक दीप जलाकर गवर पूजन स्थल पर स्थापित करती हैं. इसके बाद गणगौर तीज तक अपने परिचितों के आवास पर घुड़ला ले जाकर मां पार्वती से जुड़े गणगौर गीत गाए जाते हैं.

 

उल्लेखनीय उपस्थिति

 

रेखा सेन, मीरा देवी सेन ,चंदा त्रिपाठी, मधु सेन ,कांता दाधीच, उषा, पायल, जया, सीमा, निर्मला, मंजू, कोमल ,सारिका , अंकिता ,सरस्वती, कमला, रिंकू दाधीच अन्य महिला की उपस्थिति रही

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!